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Monday, 1 March 2010

सब हिल-मिल आज खेलो होली - सुनिये ये मालवी गीत














सब हिल-मिल
आज खेलो होरी


अध-बूढ़ा ने बूढ़ा-आड़ा
बण ग्या है छोरा-छोरी

गेंद-गुलाबी रूप लजीली
मान करे क्यूं ए गोरी

फ़ागण तो रंगरेज हठीलो
रंग दियो अंगो और चोली

बिरहण ऊबी पीहर कँवरे
मन में भरम भर्यो भोरी

(भाव:बिरहन अपने प्रीतम से दूर मायके में है
और उसके मन में कई भोली भ्रम भरे हुए हैं)

रंग की मटकी सीस भरी जद
कान्हा यें झटपट फ़ोरी

तन तो होरी चोडे खोले
मन खेले चोरी-चोरी

मन गेर्या ने जो बांधी दे
बांधो प्रीत की वा डोरी


(भावार्थ:गेर्या यानी वे हुरियारे जो रंग उड़ाते निकले हैं;
तो मन उन हुरियारों को प्रीत की डोर में बांध दे ऐसी होली खेलो)


Sunday, 28 February 2010

प्रेम अबीर उछाल;होली लाई रंग गुलाल

आप सभी को होली की राम-राम
लोक पर्वों का मज़ा ग्रामीण अंचलों में कुछ अलग ही रंगत के साथ मौजूद है.जैसी होली मैंने अपने मालवा के गाँवों में देखी है;खेली है वैसी बात अब शहरों में नज़र नहीं आती. मेरी बोली मालवी में राजस्थानी और गुजराती भाषा का वैभव बड़ी मधुरता के साथ आ समाया है .बरसों पहले यह होली गीत लिखा था जिसे बहुत पसंद किया जाता रहा है.आप अपनी ही आवाज़ में सुना रहा हूँ;मुलाहिज़ा फ़रमाएँ.


रे मनवा रंग तन,रंग मन
होली लाई रंग गुलाल

प्रीत को काजल आँख में आंजो
कारा कारा मन ने चाँदी सा मांजो
पातालाँ में गाड़ी दो मलाल

हेत को मंदर कितरो बड़ो हे
अंदर जींके साँवरो खड़ो है
श्रम के आगे हार्यो हे काल

भूख, ग़रीबी को कीचड़ कारो
कई नीं हे थारो,कई नी हे म्हारो
झूठा हे सब जंजाल


एक ऊँचो,एक नीचो बात पुराणी
भई भई मिली ने भीत गिराणीं
हाथाँ में लई लो कुदाल

भर पिचकारी,नवा नवा रंग की
थाप लगा धिना-धिन्ना मिरदंग की
प्रेम अबीर उछाल

झूठ की होली जली-जली जावे
साँच ने भई कुण, आँच लगावे
साँच हे ऊँचो भाल

शुक्रिया.हो सका तो कल एक गीत और सुनाऊंगा.

शब्दार्थ>कारा:काला/कितरो:कितना/हेत:समन्वय/हार्यो:हार गया/कुण:कौं