आप सभी को होली की राम-राम
लोक पर्वों का मज़ा ग्रामीण अंचलों में कुछ अलग ही रंगत के साथ मौजूद है.जैसी होली मैंने अपने मालवा के गाँवों में देखी है;खेली है वैसी बात अब शहरों में नज़र नहीं आती. मेरी बोली मालवी में राजस्थानी और गुजराती भाषा का वैभव बड़ी मधुरता के साथ आ समाया है .बरसों पहले यह होली गीत लिखा था जिसे बहुत पसंद किया जाता रहा है.आप अपनी ही आवाज़ में सुना रहा हूँ;मुलाहिज़ा फ़रमाएँ.
रे मनवा रंग तन,रंग मन
होली लाई रंग गुलाल
प्रीत को काजल आँख में आंजो
कारा कारा मन ने चाँदी सा मांजो
पातालाँ में गाड़ी दो मलाल
हेत को मंदर कितरो बड़ो हे
अंदर जींके साँवरो खड़ो है
श्रम के आगे हार्यो हे काल
भूख, ग़रीबी को कीचड़ कारो
कई नीं हे थारो,कई नी हे म्हारो
झूठा हे सब जंजाल
एक ऊँचो,एक नीचो बात पुराणी
भई भई मिली ने भीत गिराणीं
हाथाँ में लई लो कुदाल
भर पिचकारी,नवा नवा रंग की
थाप लगा धिना-धिन्ना मिरदंग की
प्रेम अबीर उछाल
झूठ की होली जली-जली जावे
साँच ने भई कुण, आँच लगावे
साँच हे ऊँचो भाल
शुक्रिया.हो सका तो कल एक गीत और सुनाऊंगा.
शब्दार्थ>कारा:काला/कितरो:कितना/हेत:समन्वय/हार्यो:हार गया/कुण:कौं
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Sunday, 28 February 2010
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