बोली की अपनी ख़ूबसूरती है. हालाकि भाषा पंडित बोली से
थोड़े नाराज़ ही रहते हैं . अपने अपने अंचल में बोली का
अपना विन्यास,मुहावरे,लहजा और कहन है.मालवी भी इससे अछूती नहीं है.
आलम ये है कि इन्दौर, उज्जैन,रतलाम,धार
या मंदसौर (तक़रीबन २०० कि.मी के रेडियस में)मालवी अंदाज़ बदल जाता है.
रतलाम में जो अठे (यहाँ) है वह उज्जैन में अइने हो जाता है और इन्दौर में याँ.
इस तरह से बोली हमेशा एक शब्द यात्रा में ही रहती है. आपको मेरे मुलुक
मालवा की मिठास का स्वाद चखाने के लिहाज़ से ये ग़ज़ल अपने मालवी जाजम
पर जारी कर रहा हूँ.
बेटे संजय का इसरार था कि आप सादा पंक्तियों
में मालवी मिसरे का तर्जुमा भर हिन्दीं में कर दें जिससे
मालवी न जानने वाले पाठक भी इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठा सकें .
मैने तर्जुमें यानी अनुवाद को भी तुकांत बनाने की कोशिश की है.
आशा है अनुवाद को भी तुक में पढ़ने का मज़ा भी आपको मिल सकेगा.
गर्मी ने आप-हम सब को हैरान परेशान कर रखा है ऐसे में ये
ग़ज़ल पूरे परिवेश और इंसानी रिश्तों को ज़ुबान देने का प्रयास है.
मैं विगत एक दशक से मालवी ग़ज़ल कह रहा हूँ,तीन मजमुए शाया
हो चुके है और आपको बताते हुए
ख़ुशी है कि मालवी ग़ज़लों को मैने मुशायरों में भी पढ़ा है
और जानेमाने शायरों ने भी इन्हें अपनी प्रेमल दाद दी है.
हम सब जानते ही हैं कि ग़ज़ल अब उर्दू के साथ
सिंधी,मराठी,गुजराती में भी कही जा रही है
और हाँ मालवी की साथन निमाड़ी में भी ग़ज़ल विधा में ख़ासा काम हो रहा है
जिसकी बानगी भी जल्द ही आपकी ख़िदमत में पेश की जाएगी.
(साथन यानी सखी; ये शब्द लेखक और पत्रकार श्री यशवंत व्यास का है
जो उन्होंने मालवा के अग्रणी अख़बार नईदुनिया में मालवी - निमाड़ी
कॉलम थोड़ी-घणी को शुरू करते वक़्त दिया था. यशवंत भाई
भी मेरे मालवा के ही सपूत हैं)मुलाहिज़ा फ़रमाएँ ये मालवी ग़ज़ल.....
तवा सा तमतमाता त्रास का दन
तरस का तिलमिलाता प्यास का दनतवे से तमतमाते त्रास के दिन
तरसते तिलमिलाते प्यास के दिन
अलूणी साँझ रात खाटी है
निठारा निरजला उपास का दनये फीकी साँझ -रात नफ़रत की
निपट ये निरजले उपवास के दिन
खाली हे कुवाँ-बावडी,खाली हे घट
उखड़ती सांस का विनास का दनख़ाली हैं कुएँ-बावडी और घट
घुटन के हैं उखड़ती सांस के दिन
तीखा तीखा हे बोल घाव घणा
दोगला दरद का हे फ़ाँस का दनतीख़े तीख़े से हैं ये घाव बहुत
दर्द के दोगले ये फ़ाँस के दिन
आव-आदर नीं कोई प्रीत सरम
खाटा खाटा कसा खटास का दनन कोई प्रेम-आदर लाज न शर्म
ये कैसे कटकटे खटास के दिन
हत्या हे द्वेस न्याव नी कोई
दनछता ई कसा उजास का दनहत्या है द्वेश है और न्याय नहीं
ये कैसे उजले-उजास के दिन
पीड़ा लम्बी घणी हे छाया गुम
खजूर-खेजड़ा का बाँस का दननहीं छाया है लम्बी पीड़ाएँ
बबूल,खजूर और बाँस के दिन
थू थू नाता थू थू कड़वा रिस्ता
’पटेल’ हे कठे मिठास का दनथू थू नाते हैं और कड़वे रिश्ते
पटेल कहाँ हैं वो मिठास के दिन
मुझे आपकी अनमोल दाद का इंतज़ार है.नरहरि पटेल099265-60881